This happens to be one of the most power pack interviews I have taken till date. And obvious, it takes a lot more than courage to climb heights despite being and amputee. I do not want to highlight the later because she has overcome it with all that she has ( Special thanks to Pranjali Amle for typing this down). This was first published in my college magazine, and here I am just trying to make this incredible story reach out.
सवाल:एवेरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बनकर आपको कैसा मेहसुस
होता है?
अरुणिमा सिन्हा:बहुत खुशी महसूस
होती है ये मुकाम हासिल करके लेकिन इसके अलावा और खुशी मिलती है ये सुनकर की लोग मेरी
कहानी सुनकर प्रेरित होती है की मेरे साथ इतना बडा हादसा होके भी मैने इतनी बडी कामियाबी हासिल की है | लोगो के साथ
भी कई हादसे होते है लेकिन जब वो मेरी कहानी सुनते है और प्रेरित होते है तो और भी
खुशी मिलती है |
सवाल:आपकी ये हालत होने के बावजूद आपको एवेरेस्ट पर जाने का कैसे सुझा ?
अरुणिमा सिन्हा:आदमी जब ऐसी हालत मे होता है जिस हालत मे मै हू तब उसके सामने तिन रास्ते होते है | पहला की वो हालातो से
समझौता कर ले, दूसरा की वो अपनी सारी आशाये छोड़ दे,हार मान ले उस मुश्किलों से और जो
मिल रहा है उसीमे जीने का सोचे और तिसरा रास्ता होता है जो वो खुद बनाता है और उसपे
चलने की हिम्मत रखता है | जो आदमी तीसरा रास्ता अपनाता है उसके साथ पहले कोइ नही होता
और उनको अपना रास्ता खुद बनाने मे भी तकलीफ़ होती है ,लेकिन जब वो चलता रहताहै बिना
हार माने तो उनका रास्ता अपने आप बनता जाता है | मुझे अपनी पुरी ज़िंदगी घर मे बैठकर
नही बितानी थी और लोगोने जो अपाहिज का धब्बा लगाया था उसके साथ भी नही जिना था,मुझे
बस अपनी ज़िंदगी का सबसे बडा खेल खेलना था और उसमे विजय हासिल करनी थी
| अपने नाम के आगे बेचारी ये शब्द नही लगने देना था तो बस मै निकल पडी |
सवाल : आपको एस चीज के लिये सबसे जादा प्रेरित किसने किया
?
अरुणिमा सिन्हा : सही कहा जाये तो
मुझे सबसे जादा प्रेरित मेरी कमज़ोरी ने किया , मेरा कटा हुआ पैर उसको मैने अपना हतियार बनाया |
उस हालातो मे मुझपर बहुत सारी आलोचना ये हुई
जैसे की मेरे पास रेल का तिकीट नही था इसीलिए
मै कुद गई ,या मैने खुद्खुशी करने की कोशिश की थी, ये सारी बाते होने लगी थी | अपनी उर्म के 22 सालमे मेरे साथ ये हादसा हुआ , मेरा एक पैर कट गया
मेरे शरीर का एक हिस्सा चला गया , मेरे दाये
पैर मे भी छड लगा है और उसपर ये सब आलोचनये
जो मुझपर उठ रही थी | मै उन आलोचनावो से कमजोर नही हुई , मैने उन्हीको अपना हतियार
बनाया अपनी कमजोरी को अपना हतियार बनाया और उसपे काम करना शुरू कर दिया |
और दुसरी चिजे जो मुझे प्रेरित करती
थी वो ये की युवराज सिंग जो इतनी बडी बिमारी से लड़कर आये,और स्वामी विवेकानंद उनके
विचार आज भी कोइ पढे तो वो प्रेरित होता है | सबसे जादा मेरी माँ ने मुझे प्रेरणा दी
थी,वो हमेशा कहा करती थी की आज तुम्हारी हालत कुछ भी हो लेकिन कल तुम इतिहास जरुर बनावोगी
, तो ये सब बाते मुझे प्रेरित करती थी |
सवाल : जैसे की आपने बताया की आपके साथ वो हादसा हुआ और आप
पर बहुत सी आलोचनये भी हुई तो इस प्रकार के जो महिलाओ पे अत्याचार हो रहे है इनको रोखने
के लिये क्या किया जाये इसपर आपका क्या विचार
है ?
अरुणिमा सिन्हा: सबसे पहले महिलाओ
को मजबुत होना पड़ेगा ,अगर आप मेरा उदाहरण देखे तो मुझपर भी बहुत सी आलोचनाये हुई लेकिन
मै कमजोर नही बनी और ना ही हालातोसे समझोता किया , मैने उसे चुनौती सा लिया और उसपर
विजय हासिल की और आज देखिये सबका मुह बंद है कोई कुछ नही कहता |
मै मानती हू की इसकी कोई जरुरत नही
की हर महिला को खुद को साबित करने के लिये मेरे जैसा बनना पडे, एवेरेस्ट चढना पडे |
लेकिन वो अपने हालातोसे समझौता ना करे, उनसे
लढे | उनपर जो आलोचनाये होती है , उनको वो स्वीकार ना करे , उसने लढे क्योकी ये आलोचनये
सिर्फ कुछ वक्त की होती है बाद मे आप जो कर्म करते है उन्हिसे आप जाने जाते है |
और दूसरा की मैने सरकार से भी कहा
है की अगर किसी महिला पर ऐसी आलोचनये होती है तो आप पहले उनकी समस्या को समझे, जाने
ना की उनपे आलोचनये करे | महिलाओ ने भी ऐसी महिलाओ का साथ देना चाहिये , उनकी समस्या
समझकर उनको आगे बढ़ने पर प्रेरित करना चाहिये ना की उनपर आलोचनये करनी चाहिये |
सवाल : क्या आप अपने एवेरेस्ट के सफ़र के बारे मे हमको बताऐंगी
की आपने किन किन मुशकिलो का सामना किया?
अरुणिमा सिन्हा : एवेरेस्ट पर जाते
वक्त मेरा नकली पैर निकल गया था और मेरा अक्सीजन
खतम हो रहा था ,मेरे दोस्त मुझे वापस पीछे चलने को कह रहे थे, लेकिन मैने सोचा की नही
अब पीछे नही जाना मुझे अब कुछ भी हो एवेरेस्ट
पर फतह तो हासिल करनी ही है | मुझे लोग भी बहुत बोलते थे की इतनी बड़ी चुनौती लेने की क्या जरुरत थी,तुम्हारी जान भी
जा सकती थी लेकिन मेरा सोचना है की जिस इन्सान ने अपनी जिन्दगी मे कोइ चुनौती नही लि
तो ये उसकी जिन्दगी की सबसे बड़ी चुनौती होगी | मै रेल की पटरी पर सात घंटे पडी थी और
बादमे रेल समय सारी के अनुसार ये पता चला की 49 रेल उस पटरी सि गुजरी थी , इसके बावजूद
अगर हम बच गये तो उपर वाले नि हमे कुछ इतिहास बनाने के लिये ही बचाया होगा ,इस प्रकार
मैने सोचा और मै आगे बढ़ती गई| एवेरेस्ट पर तापमान -60अंश तक कम हो जाता है और उसपर
मेरा अक्सीजन कम हो रहा था, मेरा पैर निकल रहा था,उसको निकालू तो दिक्कत ना निकालु
तो भी , अगर रुक जाउ तो ठंडी के कारण जम सकती थी,आखो से अपने आप आसू निकलना शुरू हो
गये थे तो मैने अपने नकली पैर को निकला उसको अपने दाये हाथ मे पकडा और बाये पैर को
घसिट घसिट के चलना शुरू किया और फ़िर कुछ फिट निचे आने के बाद मैने अपना पैर ठिक किया
और फ़िर निचे आयी |
सवाल : एवेरेस्ट पर पहुँचने के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया
क्या थी?
अरुणिमा सिन्हा: मै निचे बैठी और
अपने दोनो हाथ उपर करके जोर जोर से चिंलाने का मन कर रहा था और जो लोग अपनी कमजोरी
से हार मान लेते है उनको बताना था की देखो आज मै कहा पहुच गई हू , मेरे लक्ष को हासिल
कर लिया मैने | बहुत तकलिफे हुई मुझे, मेरे
दाये पैर मे छड है उसमे सुझन होने लगी ,पैर भी दर्द करने लगा था | हर कोइ बोल रहा था
की ये नही हो सकता फ़िर भी मैने हार नही मानी | पुरी दुनिया एक तरफ़ थी और मै एक तरफ़
थी | लेकिन मेरे परिवार ने कभी मेरा साथ नही छोडा वो मेरा आधार था | फिर मुझे बाकी
लोगो की कोइ परवा नही थी | वो कहते है ना अगर किसी चीज को हासिल करने के लिये आगे बढो
तो आप अकेले ही होते हो लेकिन जब उसे हासिल कर लो तो पुरी दुनिया आपके साथ होती है
|
दूसरा मैने फ़िर उन लोगो का शुक्रिया
किया जिन्होने मेरी आलोचनाये कि थी,अगर वो मेरी आलोचनाये ना करते तो मुझे इतनी हिम्मत
नही आती और मै आज इस लक्ष तक नही पहुचती | दुनिया मे दो तरह के लोग होते है , पहले
जो खुद्पे उठायी आलोचनावो को गलत तरह से लेते है और उदसिनता मे चले जाते है | और दूसरे
की जो उसे एक चुनौती सा लेते है और आगे बढते है | मैने भी मुझपे उठी आलोचनावो को एक चुनौती की तरह
लिया और अपने आप को साबित किया | फिर स्वामी विवेकानंद जी की तसविर अपने सामने रखी
क्योकि मै उन्हे बहुत मानती हू और ठाकुर माँ स्वामी उनकी भी तसविर रखी उनकी पुजा की
उनको और भगवान को धन्यवाद किया |
सवाल : आप के साथ जो हुआ वैसे हादसे रोखने के लिए आज की युवा
पिढी क्या कर सकती है ?
अरुणिमा सिन्हा : हम हमारे बिते हुये कल मे कभी नही जा सकते और अपने आज
को खुद बनाते है | आज की युवा पिढी हमारे देश का भविष्य है | एक उदाहरण देती हू , अगर
किसी परिवार मे लडकी होने वाली हो इसलिए उस महिला को भ्रुणहत्या करने को कहते है तो
उस महिलाने ही उस अपराध को रोखना चाहिए | क्योकि अगर हम युवा ही अपराध के विरुध आवाज
उठाये तो आने वाला कल बदल सकता है | हमको ये नही सोचना चाहिये की मेरे साथ ही ऐसा क्यू
हुआ बल्कि ऐसा और किसिके साथ ना हो ये सोचना चाहिये | मै भी यही सोचती हू की अगर कोइ
और अरुणिमा सिन्हा जैसी हो तो उसे मेरी जैसी तकलिफ़ और आलोचनाये ना सेहनी हो,वो बस्स
अपनी हिम्मत और लगन से आगे बढे |
सवाल : व्हाँलीबाँल कैसा अनुभव रहा है आपकी जिंदगी का?
अरुणिमा सिन्हा : वो मेरे ज़िंदगी
के सबसे अनमोल पल थे | जैसे एवेरेस्ट पर 6-7 मिनिटे थे मेरे लिये वैसे ही व्हाँलीबाँल
के वो पल खास थे मेरे लिये | चुनौती के साथ मैदान पर खेलने का मजा ही कुछ ओर होता है
| आज भी विलचैर पर बैठकर व्हाँलीबाँल खेल सकते है लेकिन मै आज तक विलचैर पर नही बैठी
| जब भी घर के बाहर लोग व्हाँलीबाँल खेलने लगते है तब मै उनके साथ खेल लेती हू
सवाल : अंत मे मै आपको कुछ शब्द बताउंगा उन शब्दो पर मै आपकी
राय छोटे छोटे वाक्यो से जानना चाहता हू |
1: महिला अधिकार प्रदान
अरुणिमा सिन्हा : महिलाओ को खुद मजबुत बनना होगा , उनको जादा
से जादा शिक्षित करना होगा | माहिलये खुद एक दूसरे का साथ दे ना की दुशमन बने |
2: सराकर
अरुणिमा सिन्हा : अगर किसी खिलाडी के साथ ऐसा कोइ हादसा हो तो सरकार
ने उनका साथ देना चाहिये |
3:राजकारण
अरुणिमा सिन्हा : मै इतना नही जानती
फ़िर भी एक उम्मीद है की अब तक जो हमारा देश लंगडा होके चल रहा था अब वो ठिक होके दौडेगा
|
4 प्रसार माध्यम
अरुणिमा सिन्हा : प्रसार माध्यमोसे
लोग जागरूक रहते है ,छोटी से छोटी बात सब तक पहुचती है
सवाल : क्या आप हमे आपके बचपन के बारे मे बताऐंगी?
अरुणिमा सिन्हा : पापा आर्मी मे
थे और माँ । छोटा सा गाँव था हमारा, पापा साइक्लिंग करते थे और हम भाइ भेहन उनके पीछे
दौडा करते थे | ऐसी ही कुछ बाते थी |
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